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Monday, July 1, 2019

मजदूरी करने वाले के लड़के ने किया कुछ ऐसा

Monday, July 01, 2019 0
मजदूरी करने वाले के लड़के ने किया कुछ ऐसा : The laborer boy did something like this Jodharam patel


हम आज एक ऐसी ब्यक्ति के बारे में बताने जा रहे है जो निकला मजदूरी करने के लिए लेकिन बन गया डॉक्टर |कोटा के बाड़मेर जिले की गुढ़ामालानी तहसील के पास डेडावास गांव है. जहां एक गरीब परिवार से रहने वाले जोधाराम पटेल ने कुछ ऐसा कर दिखाया की |जोधाराम पटेल ने अपने परिवार का नाम तो रोसन किया साथ ही साथ गाव का भी नाम रोसन किया है | जोधाराम पटेल ने इसी साल NEET के exam दिया |
जिसमे जोधाराम ने नीट में ऑल इंडिया 3886 व ओबीसी कैटेगरी में 1209 रैंक प्राप्त की है.
ऐसा नहीं है कि वो हमेशा से टॉपर रहे. साल 2012 में जोधाराम 10वीं में फेल हुए थे. जिसके बाद ही उनके पिता ने जोधा को मुंबई जाकर मजदूरी करने की सलाह दी थी.
लेकिन जोधाराम के बड़े भाई मेवाराम पटेल और उनके प्रिंसिपल ने उन्हें रोका और आगे कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद उन्होंने सरकारी स्कूल में पढ़कर 10वीं में 64 प्रतिशत अंक हासिल किए थे.
उसके बाद 12वीं में उन्हें 60 प्रतिशत अंक मिले. घर के हालात तब भी ऐसे ही थे कि 12वीं के रिजल्ट के बाद उन्हें फिर से लोगों ने शहर जाकर काम तलाशने या खेती में परिवार की मदद करने की सलाह दीं. लेकिन उनके सिर पर डॉक्टर बनने का जुनून था. इसलिए उन्होंने तैयारी शुरू की. उनकी सफलता के पीछे उनके मामा की मदद का खास योगदान है. उन्होंने उसे कोचिंग के लिए कोटा भेजा. कोटो में एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट में पढ़कर उन्होंने तैयारी की. यही नहीं जोधाराम की प्रतिभा और परिवार की परिस्थिति देख एलन ने फीस में रियायत दी.जिसका परिणाम ये हुआ कि अब जोधाराम मेडिकल कॉलेज में पढ़कर डॉक्टर बनेगा.
पांच साल की मेहनत के बाद उन्होंने नीट परीक्षा निकाल दी. इससे पहले साल 2004 में उनके गांव के एक लड़के ने डॉक्टरी की परीक्षा पास की थी. नीट के साथ-साथ जोधा ने एम्स परीक्षा में रैंक हासिल की.
जोधाराम को NEET रैंकिंग के हिसाब से जोधपुर के सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल सकता है. अब MBBS पूरा करने के बाद, जोधाराम भी अपने गांव के उन बच्चों का साथ देना चाहते हैं जिनके हालात उनके ही जैसे हैं. जोधपुर से 200 किलोमीटर दूर उनके गांव में 2010 तक बिजली भी नहीं थी. गांव की हालत शिक्षा के अनुकूल नहीं थी. इसलिए उन्होंने अपनी स्कूलिंग के.आर.पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जोधपुर से की. वहां के प्रिंसिपल ने उन्हें 10वीं के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ने के लिए काफी प्रेरित किया.

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Thursday, March 7, 2019

देहरादून में ऑटो चालक की बेटी बनी जज Judge of Auto Driver's daughter in Dehradun

Thursday, March 07, 2019 0
Judge of Auto Driver's daughter in Dehradun देहरादून में ऑटो चालक की बेटी बनी जज

पढ़िए, पूनम की सफलता की कहानी...
देहरादून के नेहरू कॉलोनी बी ब्लॉक की ऑटो चालक की लड़की पूनम टोडी ने पीसीएस जे में उत्तराखंड टॉप किया। पूनम टोडी ने बीकॉम, एमकॉम, एलएलबी और अभी टिहरी चंबा से एलएलएम कर रही हैं। पढ़ाई के साथ ही पूनम टोडी ने यूपी एपीओ का पेपर पास कर लिया था। पूनम टोडी ने बातचीत में बताया कि पीसीएस (जे) को पास करना उनका सपना था और आज वह सपना साकार हो गया है। उनकी माता गृहणी हैं। पूनम की एक बड़ी बहन और दो भाई हैं। पहले भी किए हैं प्रयास: पूनम टोडी पहले भी दो बार पीसीएस (जे) का साक्षात्कार दे चुकी हैं पर सफलता नही मिल पाई थी। लेकिन इस बार उनको सफलता मिल गई है। पूनम की मेहनत रंग लाई। बताया कि कुछ समय उन्होंने दिल्ली में रहकर कोचिंग की उसके बाद दून वापस लौटकर घर पर तैयारी की।

30 साल से ऑटो चलाते हैं पिता पूनम ने बताया कि उनके पिता अशोक कुमार टोडी ऑटो चालक हैं और दून में ही 30 साल से ऑटो चलाते हैं। पूनम अपने पिता की मेहनत से प्रेरित होकर अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाया और आज उनकी मेहनत रंग लाई है।
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Tuesday, March 5, 2019

The soldier became but Dreams were big Responsibility of four departments but completed the dream सिपाही तो बन गए लेकिन सपने बडे़ थे चार विभागों की जिम्मेदारी, फिर भी बाजी मारी

Tuesday, March 05, 2019 0
The soldier became but Dreams were big Responsibility of four departments but completed the dream (सिपाही तो बन गए लेकिन सपने बडे़ थे चार विभागों की जिम्मेदारी, फिर भी बाजी मारी)

बलिया जिले के इब्राहिमाबाद निवासी श्याम बाबू बीए द्वितीय वर्ष में ही थे कि उनका चयन 2005 में पुलिस भर्ती में हो गया। सिपाही तो बन गए लेकिन सपने बडे़ थे। प्राइवेट पढ़ाई कर बीए और फिर एमए की डिग्री हासिल की। लगन व दृढ़ इच्छाशक्ति ऐसी कि सिपाही की ड्यूटी करते हुए भी वर्ष 2017 में नेट की परीक्षा पास की। अब 14 साल तक सिपाही रहने के बाद श्याम बाबू एसडीएम बन गए हैं।

जब पीसीएस-2016 का परिणाम आया तो श्याम बाबू सिपाही से एसडीएम बन गए। श्याम बाबू के पिता धर्मनाथ गांव में ही किराना की दुकान चलाते हैं। श्याम बाबू ने गांव के प्राथमिक विद्यालय से पढ़ाई की। वर्ष 2001 में श्री सुदिष्ट बाबा इंटर कालेज रानीगंज से हाईस्कूल व 2003 में इंटर पास किया। उसके बाद इन्होंने पीजी कालेज सुदिष्टपुरी में बीए में दाखिला ले लिया। अभी बीए द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की तभी वर्ष 2005 में यूपी पुलिस में भर्ती हो गये।

सिपाही की नौकरी करते हुए ही प्राइवेट से परीक्षा देकर 2008 में बीए फाइनल की डिग्री हासिल की। इस समय फिर वे इलाहाबाद पुलिस मुख्यालय से सम्बद्ध हैं। गांव के लोग, खासकर युवाओं में जोश है।

चार विभागों की जिम्मेदारी, फिर भी बाजी मारी
बलिया। ‘जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है, कई इम्तिहान अभी बाकी है, अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीं हमने, अभी तो पूरा आसमान बाकी है' जिले में दिव्यांग कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात कृष्णकांत राय ने शायद इन पंक्तियों को ही अपना मूलमंत्र बनाया है। तभी तो सम्मानजनक सरकारी नौकरी पाने के बाद भी वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। सरकारी कार्यों की तमाम व्यस्तता के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी।

पीसीएस का रिजल्ट निकला तो उनका चयन जिला कार्यक्रम अधिकारी के पद पर हो गया है। पिछले तीन वर्षों से जिले के कई विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे केके राय की यह उपलब्धि युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।कृष्णकांत राय ने अपनी इच्छाशक्ति को कमजोर नहीं होने दिया। उनके मुताबिक अभी यह सफलता भी एक पड़ाव मात्र ही है, मंजिल तक पहुंचना बाकी है।
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Saturday, February 23, 2019

क्या केवल Hard Work से Success मिल सकती है? (Can Only Get Success From Hard Work?)

Saturday, February 23, 2019 0
क्या केवल Hard Work से Success मिल सकती है?
(Can Only Get Success From Hard Work?)


सफलता की इच्छा (Success Desire) रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं (Nothing is Impossible in this World) है। अपनी इसी इच्छा (Desire) को पूरा करने के लिए व्यक्ति कठिन परिश्रम (Hard work) करता है। वह कठिन परिश्रम के बल पर सफलता (Success) प्राप्त करना चाहता है।

थॉमस ऐ. एडीसन (Thomas A. Edison) ने सच ही कहा है–
“कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।”“There is no substitute for hard work.”

कठिन परिश्रम (Hard work) के द्वारा व्यक्ति असंभव (Impossible) को भी संभव (Possible) बना सकता है। किसी भी सफल व्यक्ति (Successful person) की सफलता का राज (Secret of success) उसके द्वारा किया गया कठिन परिश्रम ही होता है।

यानि यह कहा जा सकता है कि सफलता को पाने का एक ही रास्ता (The only way to achieve success) है और वह है– कठिन परिश्रम (Hard work)।

लेकिन कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर केवल कठिन परिश्रम के आधार पर (Only on the basis of hard work) नहीं दिया जा सकता है। जैसे–

1- क्या केवल कठिन परिश्रम (Hard work) के बल पर ही कोई भी व्यक्ति आज के समय (Time) में Success प्राप्त कर सकता है???
2- किसी भी प्रतियोगिता (Competition) या परीक्षा में लाखों लोग Participate करते हैं जिनमे से हजारों कठिन परिश्रम भी करते हैं तो क्या कारण है कि केवल कुछ लोग ही Success प्राप्त कर पाते हैं???
3- क्या कारण है कि एक विद्यार्थी (Student) रोज तीन घंटे Study करके Top कर सकता है जबकि दूसरा Student रोज आठ घंटे Study करने के बाद भी मनचाही सफलता (Desired Success) प्राप्त नहीं कर पाता है ???
4- क्या कारण है कि एक व्यक्ति Office Time से एक घंटे पहले पहुंच कर Hard Work शुरू कर देता है और Office बंद होने के एक घंटे बाद तक Hard Work करता है, फिर भी वह अपने Boss को खुश नहीं कर पाता जबकि कोई दूसरा केवल Office Time में ही Hard Work करके बॉस को खुश (Happy) कर देता है ???

इन सभी प्रश्नों (Questions) से एक बात तो समझ आती है कि केवल कठिन परिश्रम के द्वारा सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। (Success can not be achieved only by hard work.)

चलिए अब मैं आपको एक प्रेरणादायक हिंदी कहानी  बताता हूँ जिसे पढ़कर आपको इन सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे–

Hard work in the Right direction
एक बड़े नगर में एक बहुत धनी व्यक्ति (Rich man) रहता था। वह एक बहुत बड़ी संपत्ति का मालिक (Very large property owners) था। उसके दो बेटे थे। धनी व्यक्ति यह चाहता था कि भविष्य में उसकी Property का मालिक दोनों में से कोई एक बेटा बनें और दूसरा उसका सहायक बनें।

दोनों में से जो भी योग्य हो, उसी को Property का मालिक बनाया जाना था लेकिन Problem यह थी कि यह कैसे तय किया जाये कि दोनों में से कौन सा बेटा अधिक योग्य (Able) है???

बहुत सोचने के बाद धनी व्यक्ति ने एक उपाय (Solution) सोचा।
उसने अपने दोनों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा, “शहर के बाहर जो मैंने 5 एकड़ जमीन खरीदी है, उसमे मैंने कहीं पर एक लोहे के बॉक्स में कुछ धन (Money) गाड़ दिया है, तुम दोनों में से जो भी उस धन (Money) को किसी भी तरीके से खोद कर निकाल लेगा वही मेरी Property का मालिक बनेगा।”

अगले दिन सुबह को जल्दी ही उसका पहला बेटा शहर के बाहर उस जमीन पर पहुंच गया। उसने खुदाई करनी शुरू कर दी। खुदाई करते हुए उसको पूरा दिन बीत गया लेकिन पूरे दिन Hard Work के बाद भी उसे कुछ न मिला। जबकि दूसरा बेटा घर पर बैठकर कुछ सोचता रहा।

दूसरे दिन पहला बेटा कुछ देर से पहुंचा क्योकि वह पहले दिन के कठिन परिश्रम से थक गया था। उसने फिर से खुदाई शुरू कर दी लेकिन आज भी पूरे दिन Hard Work करने के बाद भी उसे असफलता (Failure) हाथ लगी।

वह थका हुआ घर पहुंचा तो उसने अपने भाई को घर पर कागज पर कुछ लिखता हुआ पाया। पहले बेटे ने उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया क्योकि वह केवल यह सोच रहा था कि अब अगले दिन सुबह ही उसे फिर से जाना है।

अब तीसरे दिन सुबह वह फिर से खुदाई करने पहुंच गया और फिर से Hard Work करने लगा। थोड़ी देर बाद उसका भाई वहां पंहुचा जिसके हाथ में एक कागज था। भाई ने पहले तो उस कागज में कुछ देखा और पूरे मैदान में अपनी नजर दौड़ाई।

बाद में एक निश्चित जगह पर उसने भी खुदाई करनी शुरू कर दी। केवल तीन घंटे के कठिन परिश्रम के बाद उसे लोहे का वह बॉक्स मिल गया जिसमे धन (Money) रखा हुआ था। धनी व्यक्ति (Rich Person) के दूसरे बेटे ने Success प्राप्त कर ली थी जबकि पहला बेटा अब भी कठिन परिश्रम से खुदाई कर रहा था।

तभी उनके पिता यानि धनी व्यक्ति (Rich Man) वहां पहुंच गया।
पहला बेटा अपने भाई की सफलता को देखकर बहुत अचंभित (Surprised) हुआ और बोला, “मैं यहाँ पर तीन दिनों से कठिन परिश्रम कर रहा हूँ लेकिन मुझे यह Box नहीं मिला लेकिन तुमने इसे केवल तीन घंटे की मेहनत से ही खोज लिया। यह कैसे संभव हुआ??? (How is it possible?)

तब उसका भाई बोला, “जब मुझे पता चला कि यह लोहे का बॉक्स इतने बड़े मैदान में कही गढ़ा हुआ है तो मैंने भी खुदाई करने का मन बनाया लेकिन इससे पहले मैंने सोचा कि इतने बड़े मैदान में यदि कठिन परिश्रम किया भी जाये तो कहाँ पर किया जाये जिससे Success मिल जाये। दूसरे दिन जब तुम कुछ देर से आये थे उस दिन सुबह को ही मैं यहाँ एक इंजीनियर को साथ लेकर आया जिसने एक मशीन से यह पता लगाया कि लोहे का बॉक्स कहाँ पर हो सकता है।

उसके बाद उसी दिन मैने एक कागज पर एक Map बनाया कि खुदाई कहाँ करनी है। और आज उसी Map के हिसाब से मैंने तीन घंटे सही दिशा में Hard Work किया और बॉक्स को पाकर सफलता प्राप्त कर ली।”

अब धनी व्यक्ति खुश था कि उसे उसकी Property के लिए एक योग्य मालिक (Eligible owner) मिल गया।

Moral Of This Motivational Hindi Story
दोस्तों! इस कहानी से हमें सफलता का एक बहुत बड़ा राज (A great secret of success) पता लगता है कि सफलता केवल कठिन परिश्रम से नहीं बल्कि सही दिशा में कठिन परिश्रम (Hard work in the Right direction) करने से मिलती है।

धनी व्यक्ति का पहला बेटा बिना किसी दिशा या योजना के केवल कठिन परिश्रम करता रहा और असफल हो गया जबकि दूसरे बेटे ने प्लान बनाकर सही दिशा में कठिन परिश्रम ( Hard work in the Right direction by making Plan) किया और सफलता प्राप्त की।

अब हमें ऊपर दिए गए तीनों प्रश्नों के उत्तर भी मिल जाते हैं।
केवल Hard Work के बल पर कोई भी व्यक्ति आज के Time में Success प्राप्त नहीं कर सकता है। कठिन परिश्रम के साथ में एक चीज और जोड़नी होगी और वह है–सही दिशा (Right direction)।

किसी भी Competition या परीक्षा में लाखों लोग Participate करते हैं जिनमे से हजारों Hard Work भी करते हैं। Success वही लोग प्राप्त कर पाते हैं जो सही दिशा में एक योजना बनाकर कठिन परिश्रम करते हैं।

एक Student रोज तीन घंटे Study करके Top कर लेता है जबकि दूसरा Student रोज आठ घंटे Study करने के बाद भी मनचाही सफलता (Desired Success) प्राप्त नहीं कर पाता है क्योकि पहले Student ने योजनागत तरीके से सही दिशा में मेहनत (Hard work in the Right direction with Plan) से Study की जबकि दूसरा केवल मेहनती (Hard working) है और मेहनत से Study करता है। दोनों में बहुत फर्क है।

सही दिशा में कठिन परिश्रम (Hard work in Right direction) करने के कारण ही केवल Office Time में मेहनत करने वाला व्यक्ति अपने Boss को खुश कर पाता है जबकि Overtime करने वाला व्यक्ति असफल (Unsuccessful) हो जाता है।

जिंदगी में सफलता पाने के लिए सूत्र
(The Formula For Success In Life)
कठिन परिश्रम + सही दिशा = सफलता

Hard Work + Right Direction = Success

अब सफलता के इस मंत्र (Success Mantra) को ध्यान में रखकर पूरे आत्मविश्वास (Self-confidence) के साथ सफलता के लिए एक योजना (A plan for Success) बनाइये।

अब इस प्लान के हिसाब से सही दिशा में कठिन परिश्रम करना (Hard work in Right direction) शुरू कर दीजिये। सफलता (Success) आपके कदम जरूर चूमेगी।
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Friday, February 15, 2019

Best Motivational Story For All Students

Friday, February 15, 2019 0
Best Motivational Story For All Students

दोस्तो ये कहानी उन सारे स्टूडेंट्स के लिए और उन सभी लोगो के लिए है जो अपनी जिंदगी में कुछ करना चाहते हैं लेकिन किसी अनजान डर की वजह से कर नहीं पा रहे …
एक बार स्वामी विवेकानंद बनारस में दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे की तभी वहां मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया. बंदरो को लगा की स्वामी जी के झोले में कुछ खाने वाला सामान है इसलिए वे उनके नज़दीक आने लगे. स्वामी जी भयभीत हो गए और डर के मारे कापने लगे | खुद को बचाने के लिए दौड़ने लगे, पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए, और वे उन्हें दौडाने लगे. पास खड़ा एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहा था, वो चिल्लाया और उसने स्वामी जी को बोला , रुको ! उनका सामना करो!
स्वामी जी तुरन्त खड़े हो गये और उनके पीछे दौड़ रहे बन्दर भी खड़े हो गये| स्वामी जी बंदरो की आँखों में आँखे डाल कर देखने लगे जैसे उन्हें उनसे बिलकुल भी डर न लग रहा हो| बंदर थोड़ी देर तक चुप चाप खड़े स्वामी जी को देखते रहे और फिर पलट कर धीरे धीरे भाग गये| इस घटना से स्वामी जी को एक बहुत बड़ी सीख मिली और उन्होंने एक बहुत मशहूर भाषण में लोगो से कहा:–
यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत,पलटो और उसका सामना करो- डर आपको तभी तक डराता है जब तक आप उससे डरते हैं| एक बार आपने डर से डरना बंद कर दिया तो वो डर अपने आप आपसे दूर भाग जायेगा| लेकिन इस डर को तभी खत्म किया जा सकता है जब आप इसका सामना करो|
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Wednesday, January 30, 2019

Bill Gates की इन बातो का ध्यान रख आप भी बन सकते है बड़े

Wednesday, January 30, 2019 0
Bill Gates की इन बातो का ध्यान रख आप भी बन सकते है बड़े(Bill Gates can become the focus of these things, you too big)
शिष्य उस खेत के नजदीक पहुँचा। तो उसने देखा की वहा खाली पड़े खेत अब फलों के बगीचों में बदल चुके थे। शिष्य ने सोचा की वह भैंस के मरने के बाद आदमी सब कुछ बेचकर चला गया होगा। यह सोचकर वह वापस लौटने लगा। तभी उसने उस आदमी को देखा। वह उसके पास जाकर बोला – शायद आपने मुझे पहचाना नहीं। सालो पहले मैं अपने गुरु के साथ आपसे मिला था। हाँ मुझे याद है। कैसे भूल सकता हूँ, उस दिन को। तुम लोग तो बिना बताये ही चले गए थे। उस रात न जाने कैसे हमारी भैंस चट्टान से गिरकर मर गयी। उस शिष्य ने पूछा – उसके बाद आपने क्या किया। उस आदमी ने बताया की पहले तो हमारी समझ में नहीं आया की क्या करे। लेकिन जीने के लिए कुछ तो करना ही था। पहले तो मैं जंगल से लकड़ियाँ काटकर उन्हें बाजार में बचने लगा। उससे कुछ पैसे मिले तो मैंने बीज खरीद कर खेतो में बो दिये। उस साल हमरी फसल भी अच्छी हो गयी। उससे जो पैसे मिले उन्हें मैंने फलों के बगीचे लगाने में इस्तेमाल किया। यह काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। और इस समय मैं फलों का सबसे बड़ा व्यापारी हूँ। मैं कभी कभी सोचता हूँ की यह सब कुछ ना हुआ होता अगर उस रात भैंस की मौत ना हुई होती।शिष्य ने उससे पूछा – यह काम आप पहले भी तो कर सकते थे। उस आदमी ने कहा – हाँ मैं कर सकता था। लेकिन मेरी जिंदगी बिना मेहनत के ही चल रही थी। मुझे कभी लगा ही नहीं की मैं इतना कुछ कर सकता हूँ।
इस Motivational Story से मैं आपको ये समझाना चाहता हूँ की क्या आपके जीवन में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं है। जो आपको बड़ा बनने से रोक रही है। अगर ऐसा है तो उसे आज ही छोड़ दो। 
आप जरूर सोच रहे होंगे की ये सब कहना आसान है लेकिन करना नहीं। अगर आपके पास कोई ऐसी चीज़ है जो आपको बड़ा होने से रोक रही है तो उसे आज ही छोड़ दो.
हाँ यह करना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन असंभव नहीं है। ऐसे बहुत से लोग है। जिन्होंने इस असंभव को संभव कर दिखाया है। अब आपको फैसला करना है की आप एक आम जिंदगी जीना चाहते है या फिर अपनी जिंदगी में कुछ अच्छा और बड़ा करना चाहते है।
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Monday, January 7, 2019

IIT-Delhi crack CAT 2018 जुड़वा बच्चों की सफलता की कहानी |

Monday, January 07, 2019 0

IIT-Delhi crack CAT 2018 जुड़वा बच्चों की सफलता की कहानी |
( IT-Delhi crack CAT 2018 Success Story of Twins )


कैट 2018: जुड़वाँ अभिषेक गर्ग और अनुभव गर्ग। 99.99 %के साथ अभिषेक दिल्ली टॉपर बने, जबकि अनुभव ने 99.97 % स्कोर किया |
अभिषेक और अनुभव गर्ग दोनों आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए करने का सपना देखते हैं। वे राजधानी से आते हैं और IIT-Delhi के छात्र हैं |
CAT 2018: वे एक ही दिन पैदा हुए थे, लगभग एक ही समय पर, इंजीनियरिंग की परीक्षा JEE में एक साथ बैठे , IIT-Delhi में शामिल हुए और आज CAT 2018 में 99 % से अधिक स्कोर किया। मिलिए जुड़वाँ अभिषेक गर्ग और अनुभव गर्ग से, जो अपने शैक्षिक जीवन में अव्वल रहे । अभिषेक के ठीक पीछे छोटे भाई अनुभव, जो 99.99 % स्कोर कर चुके हैं और दिल्ली के टॉपर हैं।
सफलता की रणनीति के बारे में बताते हुए, अभिषेक गर्ग ने कहा, “mock tests is the key to success । इसके अलावा, क्वांट (Quant) सेक्शन पर विशेष ध्यान देने के साथ पूरे साल कड़ी मेहनत ने मुझे बहुत मदद की। ”
दोनों जुड़वाँ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-Delhi) के छात्र हैं और उनके पिता थे जिन्होंने उन्हें प्रबंधन क्षेत्र में अपना करियर बनाने के लिए प्रेरित किया।
गर्ग भाइयों ने कैट के उम्मीदवारों को स्व-अध्ययन में विश्वास करने और नियमित मॉक टेस्ट के लिए उपस्थित होने का सुझाव दिया।
अभिषेक और अनुभव दोनों ही आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए करने का सपना देखते हैं। अनुभा ने कहा, "मैं अपने भाई से दो मिनट छोटा हु |और कैट परिणाम में मेरे भाई से सिर्फ 0.2 प्रतिशत पीछे हु | "मेरे माता-पिता के अलावा, TIME दिल्ली के शिक्षकों ने परीक्षाओं की तैयारी में हमारी बहुत मदद की," उन्होंने कहा।
इस साल, 11 उम्मीदवारों ने परफेक्ट 100 पर्सेंटाइल बनाए, जिनमें सात महाराष्ट्र के, दो पश्चिम बंगाल के और एक-एक कर्नाटक और बिहार के थे। कुल 21 उम्मीदवारों ने कुल 99.99 प्रतिशत अंक हासिल किए।


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Friday, December 21, 2018

13 साल के भारतीय लड़के आदित्यन राजेश दुबई में बना सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक

Friday, December 21, 2018 0
दुबई में रहने वाला 13 साल का एक भारतीय बच्चा सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक है जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई-लिखाई और खेल-कूद में मस्त रहते हैं, उस उम्र में आदित्यन राजेश एक सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे हैं. हैरानी की बात तो ये है कि महज 9 साल उम्र में आदित्यन ने अपनी पहली मोबाइल एप्लिकेशन बना ली थी. चार वर्ष पहले महज नौ साल की उम्र में अपनी पहली मोबाइल एप्लिकेशन बनाने वाला एक भारतीय बच्चा अब 13 साल की उम्र में दुबई में एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी का मालिक बन गया है |
तकनीक के इस जादूगर ने 13 साल की उम्र में अपनी कंपनी ''ट्रिनेट सॉल्यूशंस''की शुरूआत की है. आदित्यन ने दुबई के अंग्रेजी दैनिक को बताया, ''मेरा जन्म केरल के थिरूविला में हुआ था और जब मैं पांच साल का था तो मेरा परिवार यहां आ गया. पहली बार मेरे पिता ने मुझे बीबीसी टाइपिंग दिखाई थी. यह बच्चों के लिए एक वेबसाइट है जहां छोटी उम्र के छात्र टाइपिंग सीख सकते हैं.'' उन्होंने कहा कि ''ट्रिनेट सॉल्यूशंस'' में 3 एम्पलॉई हैं,|
आदित्यन कहते हैं, ''मुझे एक स्थापित कंपनी का मालिक बनने के लिए 18 की उम्र को पार करना होगा. हालांकि हम अभी से एक कंपनी के तौर पर काम करने लगे हैं. हमने अब तक 12 से ज्यादा क्लाइंट्स के लिए काम किया है |
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Thursday, December 20, 2018

मिलिए UPSC टॉपर रूक्मिणि से कक्षा 6 में हुईं फेल, फिर बिना कोचिंग के बनीं UPSC टॉपर

Thursday, December 20, 2018 0


मिलिए 2011 में दूसरा स्थान हासिल करने वाली रूक्मिणी रायर से - 2011 में यह परीक्षा पास करने वाली रूक्मिणि 6ठी कक्षा में फेल हो गई थीं और उन्होंने यह परीक्षा बिना किसी कोचिंग के पास की है |
रूक्मिणि का जन्म होशियारपुर बलजिंदर सिंह के यहां हुआ था और उन्हें छोटी सी उम्र में ही बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया था. लेकिन वो काफी परेशान हो गई और 6ठी कक्षा में फेल हो गईं | वो कक्षा चार में थीं तो उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया और मैं यह बदलाव सहन नहीं कर सकी.
रूक्मिणि को इस बात से इतना झटका लगा था कि इस दौरान वो डिप्रेशन में रहने लगीं थी. उन्हें पता ही नहीं था कि उनके साथ क्या हो रहा है | इसके साथ ही उन्होंने अपनी असफलता से सीख ली. उनका कहना है कि यदि ठान लें तो असफलताएं हमारा रास्ता कभी नहीं रोक सकतीं और उन्होंने कड़ी मेहनत की.                     
उन्होंने कहा कि फेल होने के बाद परिवार के लोग और शिक्षकों के सामने जाने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी. रूक्मिणि ये सोचकर घबरा जाती थीं कि 6वीं में फेल होने को लेकर उनके घर वाले और शिक्षक उनके बारे में क्या सोचते होंगे | आईएएस परीक्षा में शामिल होने से पहले उन्होंने कई एनजीओ के साथ काम किया. जिससे देश की हालत को बेहतर तरीके से समझ सकें.
अपनी असफलता से सीख लेते हुए उन्होंने अपने पूरे कॉलेज में भी टॉप किया. उसके बाद उन्होंने बिना कोचिंग के पढ़ाई की और परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया |
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13 साल के ऋषभ जैन ने ढूंढ निकाला अग्नाशय कैंसर का इलाज

Thursday, December 20, 2018 0
13 साल के ऋषभ जैन ने अग्नाशय कैंसर का जड़ से खत्म करने वाला इलाज ढूंढ निकाला है. ऋषभ के इस इन्वेंशन से लाखों जानों को बचाया जा सकता है |पैनक्रिएटिक कैंसर को शरीर में लोकेट करना ही बेहद मुश्किल है. इसी वजह से इस कैंसर से पीड़ित लोगों का सरवाइवल रेट सिर्फ 7 से 12 प्रतिशत ही होता है |
ऋषभ के इस आविष्कार से पैनक्रिएटिक कैंसर शरीर के किसी भी हिस्से में हो, उस जगह को टार्गेट कर इस कैंसर को धीरे-धीरे कम कर देता है. जबकि डॉक्टर अग्नाशय Pancreas के आस-पास के एरिया के सेल्स को खत्म कर इस कैंसर का इलाज करते हैं, जिसमें बहुत सारे हेल्दी सेल्स भी मर जाते हैं |
यूएस के ओरेगन शहर के इंडियन-अमेरिकन ऋषभ ने डिस्कवरी एजुकेशन 3एम यंग साइंटिस्ट चैलेंज को जीता | 
                       
इस चैलेंज में उन्हें 25000 डॉलर की इनाम राशि भी मिली |
ऋषभ ने आगे बताया कि वो भविष्य में इस राशि को खुद की बनाई नॉनप्राॉफिट समयक साइंस सोसाइटी में लगाना चाहेंगे. इसके साथ पैनक्रिएटिक कैंसर के बारे में जागरुकता फैलाना चाहेंगे |
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उत्तराखंड की दिव्या रावत नौकरी छोड़ शुरू किया मशरूम का उत्पादन खड़ी कर दी करोंडो रुपये की कंपनी.

Thursday, December 20, 2018 0
सफलता की ऐसी कहानी है उत्तराखंड की रहने वाली दिव्या रावत की. जिन्होंने मशरूम का उत्पादन शुरू कर खड़ी कर दी करोंडो रुपये की कंपनी |
दिव्या को मशरूम लेडी के नाम से जाना जाता है. नोएडा के यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है. जिसके बाद उन्होंने नौकरी करना शुरू किया. लेकिन वह जल्द ही समझ गई थी कि अगर कुछ बड़ा करना है, तो नौकरी को छोड़ना होगा. कुछ समय बाद वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गई. उन्हें शुरुआत से ही खेती में दिलचस्पी थी. जिसके बाद उन्हें आइडिया आया क्यों ना मशरूम का उत्पादन किया जाए.
जिसके बाद उन्होंने एक छोटे से कमरे में मशरूम का बिजनेस शुरू किया. धीरे-धीरे कर उनका कारोबार बढ़ा और वह अपनी कंपनी सौम्या 'फूड प्राइवेट लिमिटेड' की मालकिन भी बन गईं. बतादें, आज कंपनी का टर्नओवर लाखों में है. कंपनी के तीन मंजिले मशरूम प्लांट से भारी मात्रा में प्रोडक्शन हो रहा है. उनके प्लांट में वर्ष में तीन तरह के मशरूम उत्पादित किये जाते हैं- बटन, ओएस्टर और मिल्की मशरूम. इनकी सप्लाई उत्तराखंड में ही नहीं बल्कि दिल्ली की आजादपुर मंडी तक हो रही है.
उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की लेकिन नौकरी करने का बाद दिव्या ने अपना काम शुरू करने की ठानी. उनके काम की शुरुआत हुई साल 2012 से. दिव्या का यह सफर आज सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में खड़ा है |
जहां वह लाखों में कमाई कर रही है, वहीं उनकी कंपनी ने कई गांव के लोगों को रोजगार भी दिया है, जिसकी वजह से उनके घर का चुल्हा जल रहा है | आज दिव्या अपने कारोबार में सफल होने के साथ गांव में किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं |
आज दिव्या मशरूम के प्रॉडक्शन की ट्रेनिंग भी देती हैं | मशरूम लेडी के नाम से पहचान बनाने वाली

देहरादून की दिव्या रावत को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी शक्ति पुरस्कार से नवाजा गया | उन्होंने राष्ट्रपति भवन में हुए समारोह में यह पुरस्कार पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों ग्रहण किया था |
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Wednesday, December 19, 2018

अचार बेचकर 2000 रूपये से की शुरुआत, आज है करोड़ो का व्यापर

Wednesday, December 19, 2018 0
एक अनपढ़ कृष्णा यादव सिर्फ 3000 और एक छोटे से कमरे से अचार बनाने से शुरुआत कर करोड़ों का Business खड़ा कर सकती है |
खुद पर विश्वास, जी तोड़ मेहनत, बेस्ट क्वालिटी के 200 टाइप के अचार, करोड़ों का व्यापर और 1000 लोगों को रोज़गार देने का सफर, कृष्णा जी के लिए आसान नहीं था | पति के Business में Loss , बुलंदशहर से दिल्ली तक का सिर्फ 500 के उधार पे सफर, रोड पे सब्ज़ियां बेचकर कामयाबी न मिलना, एक साल तक Business के लिए License न मिलना, अचार का ख़राब हो जाना और ऐसी बहुत चीज़ों ने उनकी हिम्मत तोड़ने की कोशिश की, पर उन्होंने अपनी कठिनाईओं का सामना डट कर किया, और आज करोड़ो का Business कर रही है |
बहुत थोड़े से इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के कारण उन्हें प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने, और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने कृष्णा जी को नारी शक्ति पुरस्कार 2015 से नवाज़ा है | The7.in सलाम करता है कृष्णा यादव जी को |
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Tuesday, November 6, 2018

तमिलनाडु में किसान का बेटा बना डॉक्टर, मिला बाजपेयी गोल्ड मेडल

Tuesday, November 06, 2018 0
तमिलनाडु के कालिपट्टी गांव में रहने वाले मेघनाथन पी. ने. जो अब डॉक्टर बन गए हैं. मेघनाशन एक किसान के बेटे हैं और उन्होंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई को पूरा कर लिया है. यहीं नहीं किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में हुई कॉन्वोकेशन सेरेमनी में उन्हें गोल्ड मेडल से भी नवाजा गया. बता दें, पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट में बेस्ट स्टूडेंट के लिए उन्हें 'शीतला चरण बाजपेयी गोल्ड' मेडल से सम्मानित किया गया है.
मेघनाथन एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में वह इस बात को बखूबी समझते हैं कि जब गरीब के घर में कोई शख्स बीमार होता है तो पैसों की तंगी की वजह से उसके इलाज के दौरान कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. मेघनाथन अब डॉक्टर बन गए हैं. अब वह अपने गांव वापस जाना चाहते हैं जहां वह बच्चों के लिए एक हॉस्पिटल खोलना चाहते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बताया उनके गांव से हॉस्पिटल 100 किलोमीटर से भी दूर है. ऐसे में मैं चाहता हूं कि बच्चों के लिए गांव के अंदर ही एक हॉस्पिटल खोला जाए.
मेघनाथन के लिए पढ़ाई को पूरी करना इतना आसान नहीं था. उन्होंने बताया कि पढ़ने का शौक था, लेकिन पढ़ाई करना आसान नहीं था. मेरे पिता एक किसान हैं ऐसे में हमारी आर्थिक स्थिति भी सही नहीं थी. बता दें, वह रात 2 बजे से सुबह 8 बजे तक पढ़ाई करते थे. साथ ही वह अपने पिता के साथ खेतों में काम करने भी जाते थे |
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Wednesday, October 17, 2018

एना बर्न्स को मिला 2018 का मैन बुकर पुरस्कार आयरलैंड की रहने वाली है लेखिका

Wednesday, October 17, 2018 0
उत्तरी आयरलैंड की लेखिका एना बर्न्स को 2018 का मैन बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया है. उन्हें उनकी किताब 'मिल्कमैन' के लिए यह सम्मान दिया गया है. इस ऐलान के साथ ही एना बर्न्स पहली नॉर्दन आईरिश लेखिका बन गई हैं. बता दें कि उनकी यह तीसरी किताब थी.
बर्न्स की लिखी 'मिल्कमैन' किताब एक महिला के शादीशुदा शख्स के साथ अफेयर की कहानी है. साथ ही यह महिला एक ऐसे शख्स का सामना कर रही थी, जो यौन उत्पीड़न के लिए पारिवारिक रिश्तों, सामाजिक दबाव और राजनीतिक निष्ठा जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर रहा था.
जार्ज सॉन्डर्स को मिला था 2017 का मैन बुकर पुरस्कार
बर्न्स को इस पुरस्कार के साथ 50 हजार पाउंड भी दिए जाएंगे. बर्न्स की किताब को लेकर जजों ने कहा कि मिल्कमैन अद्भुत किताब है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस किताब में उस युवती के दर्द का बखूबी अहसास कराया गया है.
बुकर पुरस्कार कॉमनवेल्थ या आयरलैंड के नागरिकों की ओर से लिखे गए मौलिक अंग्रेजी उपन्यास के लिए हर साल दिया जाता है. 2008 साल का पुरस्कार भारतीय लेखक अरविंद अडिगा को दिया गया था. गौरतलब है कि अडिगा समेत 5 बार यह पुरस्कार भारतीय मूल के लेखकों को मिला है, जिसमें वी एस नायपॉल, अरुंधति राय, सलमान रश्दी और किरण देसाई आदि शामिल है |
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Tuesday, October 16, 2018

मिलिए सनी कुमार से ,सब्जी बेचने वाले के बेटे ने जेआरएफ की टॉप टेन सूची में बनाई जगह ,जाने इनकी सफलता की कहानी

Tuesday, October 16, 2018 0
सब्जी विक्रेता के बेटे ने जेआरएफ की टॉप टेन सूची में जगह बनाई है। कोटला के त्रिलोकपुर गांव के सन्नी कुमार ने सीबीएसई जेआरएफ में यह उपलब्धि हासिल की है। पूरे देश में 1148235 अभ्यर्थियों ने विभिन्न विषयों में जेआरएफ और नेट दिया था। सन्नी कुमार ने लाइब्रेरी इन्फॉरमेशन साइंस जेआरएफ पास किया है।
सन्नी के पिता शेर सिंह त्रिलोकपुर में सब्जी की दुकान करते हैं। माता गृहिणी हैं। सन्नी ने प्रारंभिक पढ़ाई त्रिलोकपुर स्कूल से की है। कॉमर्स संकाय में जमा एक व दो कोटला स्कूल और बीकॉम की पढ़ाई नूरपुर कॉलेज से की है। उसके बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला से लाइब्रेरी एंड इन्फॉरमेशन साइंस में पीजी की।
वर्तमान में सन्नी चंडीगढ़ विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में प्रोफेशनल असिस्टेंट के पद पर हैं। सन्नी ने बताया कि उन्होंने इससे पहले चार बार जेआरएफ की परीक्षा दी थी, लेकिन पास नहीं हो पाए थे।
दो साल से वे प्रतिदिन 12 से 13 घंटे पढ़ाई करते थे। उन्होंने इस बार जेआरएफ में 67 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय शिक्षकों और माता-पिता को दिया है।
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मिलिए सांभवी सिन्‍हा से डेढ़ साल में खड़ी कर दी 25 करोड़ की कंपनी, जानिए इनके बारे मे

Tuesday, October 16, 2018 0


आज महिलाएं किसी भी चीज में पीछे नहीं हैं. महिला उद्यमी अपने और अन्य लोगों के लिए नए काम लेकर आ रही हैं. भारत में चीजें डिजिटल इंडिया की ओर जा रही हैं, लेकिन आज भी लोग अपनी पारंपरिक दुकानों के प्रति लगाव महसूस करते हैं, जहां वे प्रॉडक्ट को टच एंड फील करके खरीदते हैं. ऐसी ही एक ऑनलाइन वेबसाइट चलाने वाली लड़की की सक्सेस स्टोरी से हम आपको आज रू-ब-रू करा रहे हैं. जानिए कैसे उन्होंने 1 करोड़ रुपए खर्च कर अपनी कंपनी की एसेट वैल्यू 25 करोड़ रुपए कर ली है. आज महिलाएं किसी भी चीज में पीछे नहीं हैं. महिला उद्यमी अपने और अन्य लोगों के लिए नए काम लेकर आ रही हैं. भारत में चीजें डिजिटल इंडिया की ओर जा रही हैं, लेकिन आज भी लोग अपनी पारंपरिक दुकानों के प्रति लगाव महसूस करते हैं, जहां वे प्रॉडक्ट को टच एंड फील करके खरीदते हैं. ऐसी ही एक ऑनलाइन वेबसाइट चलाने वाली लड़की की सक्सेस स्टोरी से हम आपको आज रू-ब-रू करा रहे हैं. जानिए कैसे उन्होंने 1 करोड़ रुपए खर्च कर अपनी कंपनी की एसेट वैल्यू 25 करोड़ रुपए कर ली है.
आज महिलाएं किसी भी चीज में पीछे नहीं हैं. महिला उद्यमी अपने और अन्य लोगों के लिए नए काम लेकर आ रही हैं. भारत में चीजें डिजिटल इंडिया की ओर जा रही हैं, लेकिन आज भी लोग अपनी पारंपरिक दुकानों के प्रति लगाव महसूस करते हैं, जहां वे प्रॉडक्ट को टच एंड फील करके खरीदते हैं. ऐसी ही एक ऑनलाइन वेबसाइट चलाने वाली लड़की की सक्सेस स्टोरी से हम आपको आज रू-ब-रू करा रहे हैं. जानिए कैसे उन्होंने 1 करोड़ रुपए खर्च कर अपनी कंपनी की एसेट वैल्यू 25 करोड़ रुपए कर ली है.
सांभवी का इनोवेटिव आइडिया: सांभवी सिन्‍हा ने एक ऐसा ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म खोला है, जहां पर प्रोडक्‍ट्स की बुकिंग तो ऑनलाइन होती है, लेकिन कस्‍टमर खरीदारी उसको देख-परख कर अपनी नजदीकी दुकान से कर सकते हैं. सांभवी की वेबसाइट का नाम शॉपमेट.इन है. सांभवी का इनोवेटिव आइडिया: सांभवी सिन्‍हा ने एक ऐसा ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म खोला है, जहां पर प्रोडक्‍ट्स की बुकिंग तो ऑनलाइन होती है, लेकिन कस्‍टमर खरीदारी उसको देख-परख कर अपनी नजदीकी दुकान से कर सकते हैं. सांभवी की वेबसाइट का नाम शॉपमेट.इन है.
सांभवी का इनोवेटिव आइडिया: सांभवी सिन्‍हा ने एक ऐसा ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म खोला है, जहां पर प्रोडक्‍ट्स की बुकिंग तो ऑनलाइन होती है, लेकिन कस्‍टमर खरीदारी उसको देख-परख कर अपनी नजदीकी दुकान से कर सकते हैं. सांभवी की वेबसाइट का नाम शॉपमेट.इन है.
इस तरह सांभवी ने शुरू की अपनी कंपनी: इस वेबसाइट पर आप किसी प्रोडक्‍ट को ऑनलाइन बेस्‍ट प्राइस में डील करके अपने पास की दुकान से ले सकते हैं. सांभवी ने इसके जरिए कुछ लोगों को रोजगार भी दिया है. उनकी इस कंपनी में 8 लोग काम करते हैं. सांभवी सिन्‍हा ने यह कंपनी दिसंबर, 2015 में 1 करोड़ रुपए का निवेश कर शुरू की थी. इस बिज़नेस को शुरू करने के लिए उन्होंने अपने पैरेंट्स और कुछ दोस्‍तों से मदद भी ली थी. उनकी कंपनी शॉपमेट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का कुल एसेट्स करीब 25 करोड़ रुपए है. कंपनी की सालाना इनकम 50 लाख रुपए है. इस तरह सांभवी ने शुरू की अपनी कंपनी: इस वेबसाइट पर आप किसी प्रोडक्‍ट को ऑनलाइन बेस्‍ट प्राइस में डील करके अपने पास की दुकान से ले सकते हैं. सांभवी ने इसके जरिए कुछ लोगों को रोजगार भी दिया है. उनकी इस कंपनी में 8 लोग काम करते हैं. सांभवी सिन्‍हा ने यह कंपनी दिसंबर, 2015 में 1 करोड़ रुपए का निवेश कर शुरू की थी. इस बिज़नेस को शुरू करने के लिए उन्होंने अपने पैरेंट्स और कुछ दोस्‍तों से मदद भी ली थी. उनकी कंपनी शॉपमेट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का कुल एसेट्स करीब 25 करोड़ रुपए है. कंपनी की सालाना इनकम 50 लाख रुपए है            

सांभवी सिन्‍हा इस काम से 1-2 फीसदी का ही कमीशन कमाती हैं. उनकी कंपनी दिल्‍ली, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद और नोएडा में काम कर रही है. आने वाले समय में अन्‍य शहरों में वह अपनी कंपनियों का एक्‍सपेंशन करेंगी. प्रोडक्‍ट्स की खरीदारी कोई भी कस्‍टमर कंपनी की वेबसाइट http://www.shopmate.in पर जाकर कर सकता है. साल की उम्र में किया बिज़नेस शुरू: कॉमर्स ग्रेजुएट सांभवी सिन्‍हा 25 साल की हैं. वह अमेरिका से पढ़ाई कर आई हैं. शॉपमेट एक ऐसा ऑनलाइन प्‍लेटफार्म है, जहां इलेक्‍ट्रॉनिक, आईटी, बाइक, इलेक्‍ट्रॉनिक आइटम्स जैसे लैपटॉप, टीवी, फ्रीज, वाशिंग मशीन और कार आदि की बुकिंग की जाती है, जिससे प्रोडक्‍ट्स को खरीदने और बेचने वाले दोनों को फायदा होता है. इससे कस्‍टमर को अपनी पसंद का कोई भी समान बेहतर प्राइस में अपने पास की दुकान से मिल जाता है.
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Saturday, October 13, 2018

एक अपमान की बात की ठेश ने रिक्शा चालक के बेटे को बनाया आईएएस,लोग देखकर चौंक उठे

Saturday, October 13, 2018 0
यह सच है कि जब कोई बात दिल मे चुभ जाती है तो इंसान खुद को साबित करने के लिए डट जाता है कि उसके बारे में जो बोला जा रहा है वह वैसा नहीं है। दिल पर जब कोई बात चुभती है तो इससे व्यक्ति खुद को अपमानित महसूस करता है और सकारात्मक सोच के लोग इस अपमान का बदला लेने के लिए खुद को साबित करके लोगों की बोलती बंद करते हैं।
ऐसे ही एक रिक्शा चालक ने अपने अपमान का बदला बेटे को आईएएस बनाकर लिया। यह कहानी बनारस के एक रिक्शा चालक की है। खबरों के मुताबिक रिक्शा चालक नारायण जायसवाल की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा खराब थी तो उन्होंने रिक्शा चलाकर अपने परिवार को पेट भरने लगे
उन्होंने खुद ही रिक्शे में बेटे को बैठाकर स्कूल छोड़ने जाने लगे। लेकिन लोगों ने जब देखा कि रिक्शावाला अपने बेटे को स्कूल भेज रहा है तो उसका मजाक उड़ाने लगे। मजाक उड़ाने वालों में कई लोग ऐसे भी थे जो कहा करते थे कि देखो ये अपने बेटे को आईएएस बनाने ले जा रहा है। नारायण के बेटे गोविंद जायसवाल को ये बात चुभ गई। उन्हें अपने पिता का संघर्ष और लोगों को मजाक उड़ाना बहुत बुरा लगता था। यह सब देखकर उन्होंने अपने मे मन मे ठान लिया था कि वह अपने परिवार को अब एक सम्मानजनक जीवन देंगे। लेकिन उन घर में और आसपास जो माहौल था उसे देखते हुए सिविल सर्विस की तैयारी करना बहुत कठिन था।
घर वालों ने जमीन बेचकर दिए पैसे
इन सब के बावजूद उन्होंने ठान लिया था कि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी करेंगे और इसी में कुछ करके दिखाएंगे। उनके पास पैसे नहीं थे कि जिससे वह कोई बिजनेस या काम धंधा कर सकें ऐसे में उनके पास सिर्फ एक ही विकल्प था कि खूब पढ़ाई करें और यूपीएससी की परीक्षा पास करे
गोंविद के लिए सपनों को पूरा करना बेदह मुश्किल था। वह जिस एक कमरे के घर में रहते उसमें उनका पूरा परिवार रहता था। उनका घर शहर से कुछ दूरी पर था और यहां पर लाइट की कटौती भी खूब होती। लिहाजा रात में उन्हें ढिबरी या मोमबत्ती के सहारे पढ़ाई करनी पड़ती।
गोविंद को कोचिंग के लिए कुछ पैसों की जरूरत थी तो उनके पिता ने अपनी पुश्तैनी जमीन 30000 रुपए में बेच दी थी। लेकिन इससे भी उनका काम नहीं चला तो गोविंद पार्ट टाइम कुछ बच्चों को मैथ का ट्यूशन देने लगे।
गोविंद अपने मुश्किल दिनों को याद करते हुए मीडिया से बताया कि वह एक बार कुछ बच्चों के साथ खेल रहे थे तभी एक शख्स और चिल्लाने लगा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारे बच्चों के साथ खेलने की। तुम एक रिक्शेवाले के बच्चे हो। तुम्हें भी आगे चलकर रिक्शा चलाना है। ऐसा सुनकर गोविंद को बहुत बुरा लगा और उन्होंने सोचा कि अब वह ऐसा काम करेंगे जिसके लिए उन्हें सभी लोग सम्मान से देखेंगे।
इसके बाद गोविंद ने किसी प्रकार से बीए की पढ़ाई पूरी कर दिल्ली की ओर निकल पड़े। उनका एक ही लक्ष्य था आईएएस बनना। इस दौरान गोविंद के घरवालों ने उन्हें हर संभव मदद और हौसला दिया। इसके बाद 2006 में यूपीएसएसी का जब फाइनल्स का रिजल्ट आया तो वह 474 सफल होने वाले अभ्यर्थियों में उन्हें 48वां स्थान मिला।
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Friday, October 12, 2018

1009 बार नाकामयाबी पाई थी पर फिर भी वो रुके नहीं आज एक अरबपति और KFC Chicken comapny मालिक

Friday, October 12, 2018 0
कर्नल सैंडर्स नाम के व्यक्ति जो आज एक अरबपति और KFC Chicken comapny का मालिक है, इन्होने अपनी success को हासिल करने से पहले तक़रीबन 1009 बार नाकामयाबी पाई थी पर फिर भी वो रुके नहीं और आज उन्होंने साबित कर दिया की कोशिश करने वाली की कभी हार नहीं होती.
आपको KFC का चिकन पसंद है या नहीं लेकिन KFC के success के पीछे कर्नल सैंडर्स की story आपको जरुर पसंद आएगी। एक बार किसी कारण से कर्नल सैंडर्स का चलता हुआ बिज़नस बंद हो गया। उस वक्त उनकी उम्र 65 हो चुकी थी और हाल यह था की खोने के लिए अब उनके पास में कुछ भी नहीं बचा था।
उनको अपने चिकन प्रयोग पर बहुत भरोसा था, वो मसाले और प्रेसर कुकर लेकर अपनी चिकन बनाने का प्रयोग की मार्केटिंग करने निकल पड़े। उन्होंने अलग-अलग रेस्टोरेंट से मिलना शुरू किया। और सब उनको रिजेक्ट करते गये।
लेकिन कर्नल सैंडर्स भी अड़े रहे, लगे रहे, सीखते रहे और चलते रहे। और करते-करते एक हजार नौ (1009) लोगो ने उनको रिजेक्ट कर दिया फिर जाकर उनको मिली उनकी पहली हाँ।
हाँ अपने सही पढ़ा है, एक हजार नौ बार रिजेक्ट होने के बाद, एक हजार नौ बार ना सुनने के बाद उनको उनकी पहली हाँ मिली।
सोचो 65 की उम्र में, एक एसी उम्र जब लोग रिटायर हो जाते है, एक इस उम्र में जब लोग दुबारा उठने से हार मान लेते है। उस उम्र में उन्होंने अपने चिकन प्रयोग के साथ एक ऐसा बिज़नस खड़ा कर दिया जो आज 120 देश में है, 18000 से ज्यादा KFC के रेस्टोरेंट्स (Restaurants) है और 20 अरब डॉलर से ज्यादा उनका एक साल की कमाई है।
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अंसार शेख बने सबसे कम उम्र में आईएएस,जानिए उनके सफलता के राज़

Friday, October 12, 2018 0

                                                                       THE7.IN
अंसार शेख जालना जिले के शेलगांव में पैदा हुआ, जो मराठवाड़ा में पड़ता है। अंसार शेख पिता ऑटो चलाते थे और मां, जो उनकी दूसरी बीवी थी, खेत मजदूर थी। घर में ज्यादातर समय अनाज की किल्लत रहती थी, क्योंकि हमारा पूरा इलाका सूखाग्रस्त है। शिक्षा की कमी के कारण गांव में लड़ाई-झगड़े और शराब पीने की आदत आम थी। बचपन में लगभग हर रात को मेरी नींद शोर-शराबे के कारण टूट जाती थी। पिता शराब पीकर देर रात घर लौटते और मां से झगड़ा करते थे।
जिला परिषद के जिस स्कूल में मैं पढ़ता था, वहां मिड डे मील में अक्सर कीड़े मिलते थे। बारहवीं में मुझे 91 फीसदी अंक मिले, तो गांव के लोगों ने मुझे अलग तरह से देखना शुरू किया। पुणे के नामचीन फर्गुसन कॉलेज में दाखिला लेना मेरे लिए एक कठिन फैसला था। मेरे पास चप्पल और दो जोड़ी कपड़े थे। मराठी माध्यम से पढ़ाई करने और पिछड़े माहौल में रहने के कारण मैं अंग्रेजी से डरता था। फिर भी मैंने हार नहीं मानी। पिता अपनी आय का एक छोटा हिस्सा मुझे भेजते थे, जबकि भाई हर महीने छह हजार रुपये, जो उनका वेतन था, मेरे खाते में डाल देते थे।      
मेरी बहनों की शादी कम उम्र में कर दी गई थी और भाई छठी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर चाचा के गैराज में काम करने लगा था। लेकिन मुझे पढ़ने का चस्का लग गया था। जब मैं चौथी कक्षा में था, तब मेरे रिश्तेदारों ने पिता पर मेरी पढ़ाई छुड़वा देने का दबाव डाला। एक दिन पिता ने मेरे शिक्षक से स्कूल में मुलाकात की और कहा कि वह मेरी पढ़ाई बंद कराना चाहते हैं। शिक्षक का कहना था, आपका लड़का बहुत जहीन है। उसकी पढ़ाई पर खर्च करें। वह आप लोगों की जिंदगी बदल देगा। पिता के लिए यह नई बात थी। उसके बाद उन्होंने कभी मेरी पढ़ाई के बारे में कुछ नहीं कहा
फर्स्ट ईयर में ही प्रोफेसरों ने मुझे यूपीएससी परीक्षा के बारे में बताया। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ मैंने यूपीएससी की कोचिंग के बारे में भी सोचा। पर उसकी फीस दे पाना मेरे लिए आसान नहीं था। कोचिंग कराने वाली यूनीक एकेडमी की फीस सात हजार रुपये थी। मैंने एकेडमी के टुकाराम जाधव सर से मुलाकात की और अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताया। मुझसे बातचीत करने के बाद उन्होंने फीस में पचास फीसदी कटौती कर दी।
वहां कोचिंग करने वाले युवा बीस से तीस साल के थे, और कई तो एक से अधिक बार यूपीएससी दे भी चुके थे। मैं उनमें सबसे छोटा था और सबसे पीछे बैठता था। जब मैं सर से ऊटपटांग सवाल पूछता, तो वे मेरा मजाक उड़ाते। तब पैसे के अभाव में मुझे वड़ा-पाव पर पूरा दिन गुजारना होता और दोस्तों से स्टडी मैटेरियल लेकर उनकी फोटोकॉपी करानी पड़ती।
इसके बावजूद मैंने मेन्स क्लियर किया। इंटरव्यू में मुझसे मुस्लिम युवाओं के कट्टरवादी संगठनों से जुड़ने पर सवाल किया गया। एक ने मुझसे पूछा कि मैं शिया हूं या सुन्नी। मैंने कहा, सबसे पहले मैं भारतीय हूं। इस तरह 21 साल की उम्र में अपनी पहली ही कोशिश में मैं आईएएस हो गया। मेरा मानना है कि गरीबी और प्रतिकूल स्थिति आपके दृढ़ इरादे को नहीं बदल सकती। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यूपीएससी में लाखों छात्रों से मुकाबला है। बल्कि मुकाबला सिर्फ अपने आप से है। आज मैं अपने इलाके के युवाओं की प्रेरणा बन गया हूं और मैं उनका जीवन बदलने की कोशिश भी कर रहा हूं।
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